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मां को नहीं पहचान पाया
परवीन के किराएदार ऑटो चालक मोहम्मद अरमान को राजू बरौनी में भटकते मिला और उसे काम देने की मांग की थी। काम मिलने के बाद वह उसके साथ उसके घर में रहने लगा। अचानक एक दिन परवीन ने चाय पीने के दौरान राजू को देखा तो वह उसे पहचान गई, लेकिन राजू अपनी मां को पहचान नहीं पाया। परवीन ने उसे फोटो एलबम दिखाया और बचपन के दोस्तों को दिखाया तब जाकर उसे याद आया और उसने अपनी मां को पहचान लिया।

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स्टेशनों पर घूमता रहा
राजू की बिछड़ने की दास्ता काफी दुखदायी है। राजू बताता है कि उसे मुडन के दौरान कुछ लोग जबरन उठाकर ले गए और उसे सुई व दवा देकर रखा जाता था। अपहरण करने वाला उसे अपना बेटा बताता था। राजू धीरे धीरे सबकुछ भुल गया और उसी दंपत्ति को अपना मां-बाप मान लिया। चार साल के बाद जब बाहर खेल रहा था तभी उसे एक दोस्त ने बताया कि उसके मां-बाप झुठ बोलते हैं, उसे कहीं से लाया गया है। इसके बाद राजू वहां से भाग गया। उसे सिर्फ इतना याद था कि उसका घर रेलवे स्टेशन के पास है। तीन साल से वह रेलवे स्टेशन के आस पास गांव को खोजता रहा। घर की तलाश के क्रम में राजू बनारस, इलाहाबाद, भटनी, देवरिया सहित कई स्टेशनों पर रात गुजारी पर घर नहीं मिल रहा था।

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